…तो क्या थाली बजाकर और दीया जलाकर भाग जाएगा करोना?

 …तो क्या थाली बजाकर और दीया जलाकर भाग जाएगा करोना?

कोविड-19 नामक महामारी ने सम्पूर्ण विश्व के अधिकतर देशों को अपना शिकार बना रखा है। कोरोना नामक राक्षस लोगों की जीवन लीला समाप्त करने में लगा हुआ है, सभी देश अपने-अपने नागरिकों को बचाने के लिए तरह-तरह की रणनीति बना रहे है। इसी क्रम में हमारा देश भी एकजुट होकर अपने सीमित संसाधनों के बावजूद इस महामारी से लडऩे की पूरी कोशिश कर रहा है।

हमारे चिकित्सक, पुलिस बल, सैनिक, कॉरपोरेट समूह एवं अन्य सभी कामगार अपने-अपने दायरे में इस बीमारी से लड़ रहे हैं। आप भी इस बीच जनता को इस बीमारी के प्रति जागरूक करने के लिए सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से पहल करते नजर आ रहे हैं।

अब आते हैं मुद्दे की बात पर। पिछले दिनों हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने कोरोना वायरस के प्रभाव को रोकने के लिए ‘जनता कफ्र्यू’ घोषित किया और शाम को कोरोना फाइटर्स के उत्साहवर्धन हेतु घर की बालकनी में ताली-थाली, घंटी बजाने का आह्वान किया लेकिन कुछ उत्साही लोगों ने इसके बिल्कुल उलट प्रतिक्रिया दिखाई। हैरानी तो इस बात की है कि प्रधानमंत्री जी के गृहराज्य अहमदाबाद के कुछ जगहों पर लोगों ने समूह बनाकर रैलियां निकाली। उत्तर प्रदेश में भी एक जिले के डीएम और एसपी घंटा और शंख बजाते नजर आए।

खैर, ऐसा करने से लोगों की समझ उजागर हुई। उन्हें कोरोना कोई ‘बुरी नजर’ की तरह लगा जिसे घंटा, थाली और ताली बजाने के साथ ही दिया जलाने से उतारा जा सके। इतना ही नहीं लोग कोरोना को तो अपने गली मोहल्ले से भी दूर करके आए। दुख की बात तो यह है कि कई जगह पर कोरोना फाइटरों को मोहल्ले और कालोनी वालों के बहिष्कार का सामना करते हुए पत्थर खाने पड़े।

सवाल तो यह उठता है कि प्रधानमंत्री जी, आपके द्वारा 23 मार्च की शाम को अचानक घोषित किए गए देशव्यापी लॉकडाउन से शहरों में जो अफरातफरी मची और उसके बाद जो बड़े-बड़े शहरों से मजदूरों का पलायन हुआ, उनके दुख-दर्द का आपको अंदाजा नही था?

खैर, कोई बात नहीं। वैसे भी आपने जिस ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ का पालन करने की सलाह दी है वो तो हमारे देश में हज़ारों साल से जाति और धर्म के नाम पर अभ्यास किया जाता रहा है। अगर यहां इस व्यवहार को ‘फिजक़िल डिस्टेंस’ का नाम दिया जाए तो ज्यादा अच्छा रहता।

लॉकडाऊन के दौरान दिहाड़ी मजदूर और गरीब लोग पलायन करने को मजबूर
हो गए। इस संकट की घड़ी में वो अपने परिवार के साथ कोसो चले कुछ ने तो रास्ते में ही दम तोड़ दिया। कुछ जगह देखा गया कि इन मजदूरों पर शुद्धिकरण के नाम पर केमिकल वर्षा की गई। सवाल यह उठता है कि क्या किसी ने हवाई यात्रा करने वालों पर भी ऐसी वर्षा होते देखा? शहरों से बेघर हुए लोगों को पुलिस बल की हिंसा झेलनी पड़ी जिसका कारण सरकार द्वारा लॉकडाउन करने से पहले पर्याप्त तैयारी का अभाव था।

प्रधानमंत्री जी, एक तरफ तो मौसम की अनिश्चितताएं और ऊपर से इस महामारी का प्रकोप। ऐसे में आपसे उम्मीद थी कि आप कुछ अन्य मुद्दों पर बात करते जिसकी अपेक्षा देशवासी आपसे करते हैं। जैसे कि हमारे देश में फैली इस महामारी से लडऩे के लिए सरकार किन-किन उपायों पर विचार कर रही है।
टेस्ट की संख्या बढ़ेगी या नहीं, डाक्टरों की संख्या बढाई जाएगी या नहीं, लॉकडाउन की आगे की समीक्षा, बच्चो की पढाई-लिखाई पर बात, किसानों-मज़दूरों की समस्या, विधवा-बूढों की समस्या, मीडिया के साम्प्रदायिक एजेंडे की समस्या इत्यादि पर भी यदि आप बात करते तो अच्छा होता।

लेकिन ऐसा नही हुआ। आप टेलीविजन पर आए और दीया, मोमबत्ती और टॉर्च जलाकर एकजुटता की बात कहकर चले गए। अगर, थाली बजाकर और दीया जलाकर कोरोना को भगाया जा सकता तो यह हमारे डॉक्टरों का अपमान होगा जोकि दिन रात साधनों की कमी होने पर भी देश सेवा में लगे हुए है।

वहीं समाज का एक वर्ग ऐसा भी है जिसकी नासमझी ने देश को संकट में डाल दिया है, ऐसे लोगों को सरकार का साथ देना चाहिए ताकि कोरोना जैसे दुश्मन को भगाया जा सके वहीं दूसरी तरफ ऐसे हालात में भी जो राजनेता जाति-धर्म का मुद्दा भुनाने में लगे हैं उन्हे ओच्छी राजनीति करने से बाज आना चाहिए तभी इस समस्या से बचा जा सकता है।

Sulekha Prasad

Sulekha Prasad

"Inspiringly inspired to inspire." Grounded journalist, hungry for growth and development, with the attitude of serving society with all that I have learnt so far and will learn.

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